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हमेशा याद रहेंगे गोर्बाचेव

 

सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के निधन से एक बड़ी शख्सियत का अवसान हो गया। बीसवीं शताब्दी के सबसे बड़े नेताओं में शुमार गोर्बाचेव बहुत कम समय तक (1985-1991) सत्ता में रहे‚ लेकिन इस अल्प अवधि में उन्होंने जो सुधारवादी कदम उठाए उससे दुनिया का मानचित्र बदल गया। गोर्बाचेव द्वारा सोवियत संघ में लागू की गई पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लास्नोस्त (खुलापन) की नीतियों ने उन्हें विवादास्पद भी बना दिया। ‘पेरेस्त्रोइका’ आर्थिक सुधारों को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई थी जबकि मार्क्सवादी व्यवस्था में सर्वहारा के अधिनायकवाद के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाए गए तालाबंदी की जगह ‘ग्लास्नोस्त’ के विचारों को अमल में लाया गया। कम्युनिस्ट दुनिया के लोगों के लिए वे एक संकट की तरह थे दूसरी ओर लोकतांत्रिक विश्व के लिए वे एक वरदान थे। उनके सुधारों ने वैश्विक स्तर पर कम्युनिस्ट आंदोलन को बहुत बड़ा झटका दिया। सोवियत संघ का बिखराव हुआ। पूर्वी यूरोप के प्रायः सभी कम्युनिस्ट देशों से साम्यवादी व्यवस्था खत्म हो गई। भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन भी बहुत कमजोर पड़ गया। चीन में अगर कम्युनिज्म बना रहा तो इसके अलग ऐतिहासिक कारण थे। लेकिन गैरकम्युनिस्ट देशों ने गोर्बाचेव के सुधारों का स्वागत किया। गोर्बाचेव के नेतृत्व में ही सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता हुआ। इस समझौते के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ के बीच जारी शीतयुद्ध समाप्त हुआ और दोनों के बीच परमाणु टकराव की आशंका का अंत हुआ। उन्हें 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया‚ लेकिन आज जब रूस और यूक्रेन का संघर्ष देखते हैं तो लगता है कि सोवियत संघ का विघटन हो जाने देकर गोर्बाचेव ने गलती की थी। उन्होंने परिकल्पना की थी कि उनके सुधारों से दुनिया के सभी राष्ट्र वैश्विक संघर्ष से मुक्त हो जाएंगे‚ लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर हुआ यह कि पूर्व सोवियत संघ के राज्यों के पारस्परिक संबंध कटु होते चले गए। गोर्बाचेव को लेकर भले ही विभिन्न मत हों‚ लेकिन विश्व इतिहास में उनको इसलिए याद रखा जाएगा कि उनके नेतृत्व में वैश्विक परिदृश्य ने बड़ी करवट ली।

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