🔶सोवियत संघ के आखिरी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव का बुधवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। बीसवीं सदी के सबसे बड़े नेताओं में शुमार गोर्बाचौव को सोवियत संघ में लागू की गई ग्लासनोस्त (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्गठन) की नीतियों के लिए जाना जाता है। हालांकि इसी ग्लासनोस्त की नीति के चलते सोवियत संघ का विघटन हुआ।
अमेरिका के साथ परमाणु हथियार नियंत्रण समझौता कर गोर्बाचोव ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से जारी शीतयुद्ध खत्म किया। इसी के चलते उन्हें 1990 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गोर्बाचौव की नीतियों से कई मौकों पर असहमति जताई लेकिन उनके निधन पर शोक जताते हुए उन्हें इतिहास बदलने वाला नेता बताया है। गोर्बाचोव के निधन पर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों सहित कई नेताओं ने शोक जताया है।
🔶भारत के साथ संबंधों को हमेशा महत्व दिया गोर्बाचोव ने
मिखाइल गोर्बाचौव के राष्ट्रपति के कार्यकाल में सोवियत संघ भले ही झंझावातों से जूझकर विघटित हुआ हो लेकिन भारत के साथ रूस और विघटित देशों के संबंध मजबूत बने रहे। गौर्बाचौव ने भारत के साथ संबंधों को हमेशा महत्व दिया और उनमें तनिक भी कमजोरी नहीं आने दी। गोर्बाचौव 1986 और 1988 में भारत आए। इन दौरों में उन्होंने भारत के साथ रक्षा और आर्थिक सहयोग मजबूत करने वाले समझौते किए। 1986 में 100 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ गोर्बाचौव का भारत दौरा सोवियत संघ के राष्ट्रपति के रूप में एशिया का पहला दौरा था।
